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मनीषा भांबरी ने रचा इतिहास, विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में जीता स्वर्ण पदक

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पिता को खोने के बाद टूट गई थीं मनीषा, अब विश्व चैंपियन बन पिता का सपना किया पूरा

नई दिल्ली। कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो मुश्किल से मुश्किल हालात भी इंसान को मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकते। भारतीय महिला पहलवान मनीषा भांबरी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने न केवल इतिहास रचा, बल्कि अपने दिवंगत पिता के उस सपने को भी पूरा किया, जिसे पूरा होते देखने की उनकी ख्वाहिश अधूरी रह गई थी। जीत के बाद मनीषा ने अपने माता-पिता की तस्वीरों वाली सफेद टी-शर्ट लहराकर उन्हें भावुक श्रद्धांजलि दी। उनकी यह तस्वीर अब एक बेटी के संघर्ष, समर्पण और परिवार के प्रति प्रेम की कहानी बयां कर रही है।

फाइनल में अमेरिकी पहलवान को हराकर जीता स्वर्ण

हरियाणा के जींद की रहने वाली 29 वर्षीय मनीषा भांबरी ने 59 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल मुकाबले में अमेरिका की अबीगैल एलिजाबेथ नेट को 8-6 से शिकस्त दी। इस शानदार जीत के साथ उन्होंने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

इस उपलब्धि ने मनीषा को भारतीय कुश्ती के इतिहास में खास स्थान दिला दिया। वह विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गईं। इससे पहले भारतीय पहलवान सुशील कुमार ने वर्ष 2010 में विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया था।

मैट पर मिली इस जीत के बाद मनीषा का जश्न सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उसमें वर्षों की मेहनत और अपने माता-पिता के सपने को साकार करने की खुशी भी शामिल थी।

भाई को कबड्डी खेलते देखकर जागा था खेल का जुनून

मनीषा का संबंध हरियाणा के एक किसान परिवार से है। उनके परिवार में पहले से ही खेल के प्रति रुचि रही है। उनके भाई रिंकू कबड्डी खिलाड़ी हैं, जबकि उनकी भाभी ममता सिहाग भी कुश्ती से जुड़ी हुई हैं।

रिंकू के मुताबिक, मनीषा बचपन में उन्हें गांव में कबड्डी खेलते हुए देखा करती थीं। भाई को खेलते देखकर ही उनके मन में खेल के प्रति दिलचस्पी पैदा हुई। बाद में परिवार ने उनकी रुचि और शारीरिक क्षमता को देखते हुए उन्हें किसी व्यक्तिगत खेल में आगे बढ़ाने का फैसला किया।

मनीषा की शारीरिक मजबूती और मानसिक दृढ़ता को देखते हुए कुश्ती को उनके लिए बेहतर विकल्प माना गया। परिवार के इस फैसले ने उन्हें उस राह पर आगे बढ़ाया, जहां आज उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर दिया है।

माता-पिता की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनकर पूरा किया वादा

विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए अस्ताना रवाना होने से पहले मनीषा ने अपने माता-पिता की तस्वीरों वाली एक सफेद टी-शर्ट तैयार करवाई थी। उनके मन में विश्वास था कि वह प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतेंगी और फिर इस टी-शर्ट को दुनिया के सामने लहराकर अपने माता-पिता को अपनी जीत समर्पित करेंगी।

उनके भाई रिंकू ने बताया कि मनीषा ने प्रतियोगिता के लिए रवाना होने से पहले ही यह टी-शर्ट बनवा ली थी। उन्हें भरोसा था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होंगी।

फाइनल में अमेरिकी पहलवान को हराने के बाद मनीषा ने ठीक वैसा ही किया, जैसा उन्होंने सोचा था। स्वर्ण पदक जीतने के बाद माता-पिता की तस्वीरों वाली टी-शर्ट लहराकर उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि को उनके नाम कर दिया।

रिंकू के अनुसार, विश्व चैंपियन बनना पूरे परिवार का सपना था। मनीषा की इस जीत ने न केवल परिवार की उम्मीदों को पूरा किया, बल्कि उनके दिवंगत पिता के सपने को भी एक भावुक अंजाम दिया।

कई भारवर्गों में आजमाई किस्मत, 59 किलो में मिली सबसे बड़ी सफलता

मनीषा का कुश्ती करियर चुनौतियों और बदलावों से भरा रहा है। उन्होंने अपने सफर के दौरान 62 किलोग्राम, 65 किलोग्राम और 57 किलोग्राम भारवर्ग में भी मुकाबले किए। हालांकि, उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 59 किलोग्राम भारवर्ग में हासिल हुई, जो गैर-ओलंपिक श्रेणी है।

एशियाई चैंपियनशिप में भी मनीषा ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। वह इस प्रतियोगिता में तीन और पदक जीत चुकी हैं, जिनमें पिछले वर्ष का स्वर्ण पदक भी शामिल है। अब विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर उन्होंने अपनी उपलब्धियों में एक और ऐतिहासिक अध्याय जोड़ दिया है।

दर्द को ताकत बनाकर रचा इतिहास

मनीषा भांबरी की सफलता केवल एक स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं है। यह उस बेटी की कहानी है, जिसने पिता को खोने का गम सहा, मुश्किल दौर में खेल छोड़ने का विचार किया, लेकिन परिवार के सहयोग और अपने दृढ़ संकल्प के दम पर दोबारा खड़ी हुई।

कभी गांव में भाई को कबड्डी खेलते देखकर खेल की दुनिया में कदम रखने वाली मनीषा आज विश्व चैंपियन हैं। उनकी इस उपलब्धि में वर्षों का अभ्यास, परिवार का त्याग और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण शामिल है।

भले ही उनके पिता आज इस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए उनके साथ नहीं हैं, लेकिन माता-पिता की तस्वीर वाली टी-शर्ट लहराकर मनीषा ने उन्हें अपनी जीत का हिस्सा बना लिया। उनका स्वर्ण पदक इस बात की मिसाल है कि अपनों की यादें और उनके सपने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकते हैं।

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