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भारतीय एलपीजी टैंकर ‘ग्रीन आशा’ ने पार किया संकट क्षेत्र

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पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ी राहत की खबर आई है। रविवार, 5 अप्रैल, 2026 को भारतीय ध्वज वाले जहाज ‘ग्रीन आशा’ (Green Asha) ने सफलतापूर्वक हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर लिया है। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से इस खतरनाक मार्ग को पार करने वाला यह नौवां भारतीय एलपीजी (LPG) टैंकर है।

लगभग 15,400 टन एलपीजी लेकर आ रहा यह जहाज ‘ग्रीन सांवी’ (Green Sanvi) के सफल पारगमन के ठीक 48 घंटे बाद सुरक्षित बाहर निकला है। यह भारत सरकार और भारतीय नौसेना के उस समन्वित प्रयास का हिस्सा है, जिसके तहत खाड़ी में फंसे ऊर्जा शिपमेंट को बाहर निकाला जा रहा है।

युद्ध के साये में समुद्री यात्रा

शिपिंग डेटा के अनुसार, ‘ग्रीन आशा’ ने 30 मार्च को संयुक्त अरब अमीरात के अल रम्स बंदरगाह से अपनी यात्रा शुरू की थी। एमओएल इंडिया (MOL India) के स्वामित्व वाले और भारत पेट्रोलियम (BPCL) द्वारा चार्टर्ड इस जहाज ने लरक, हॉर्मुज और केश्म द्वीपों के पास से गुजरते हुए अपनी गति 12.8 नॉट्स बनाए रखी। यह क्षेत्र ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की कड़ी निगरानी में है।

यद्यपि यह जलमार्ग तकनीकी रूप से खुला है, लेकिन युद्ध की स्थिति ने इसे दुनिया का सबसे संवेदनशील क्षेत्र बना दिया है। ईरान ने अब सभी “गैर-शत्रु” जहाजों के लिए विशेष अनुमति और समन्वय प्रोटोकॉल लागू कर दिए हैं।

आर्थिक महत्व: भारतीय रसोई की सुरक्षा

‘ग्रीन आशा’ की सफलता केवल एक जहाज की यात्रा नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीय परिवारों के लिए ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने का एक जरिया है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और अपनी जरूरत का 60% हिस्सा आयात से पूरा करता है। इस आयात का 90% हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ही भारत आता है।

मौजूदा संघर्ष के कारण, मध्य पूर्व से भारत को होने वाले एलपीजी निर्यात में भारी गिरावट आई है। सामान्य रूप से प्रति माह 20 लाख टन आने वाला आयात अप्रैल में अब तक केवल 3.35 लाख टन रह गया है।

“प्रत्येक सफल पारगमन लाखों भारतीय परिवारों के लिए एक जीवन रेखा है। हम विदेश मंत्रालय और नौसेना के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि युद्ध की इस अनिश्चितता के बीच भी हमारा ऊर्जा गलियारा चालू रहे,” मुकेश मंगल, अतिरिक्त सचिव, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने कहा।

2026 का हॉर्मुज संकट

दुनिया के पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20% हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। 2026 का यह संकट तब शुरू हुआ जब अमेरिका के नेतृत्व में ईरान के ऊर्जा संयंत्रों और सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए। इसके जवाब में ईरान ने ‘नया फारस की खाड़ी आदेश’ लागू किया, जिसके तहत जहाजों पर सुरक्षा शुल्क और कड़ी निगरानी रखी जा रही है।

जहाँ बीडब्ल्यू टायर, बीडब्ल्यू एल्म और जग वसंत जैसे सात अन्य बड़े जहाज पिछले सप्ताह भारत पहुंच चुके हैं, वहीं ‘जग विक्रम’ नाम का एक और महत्वपूर्ण टैंकर अभी भी सुरक्षित मार्ग के इंतजार में खाड़ी के पश्चिमी हिस्से में फंसा हुआ है।

20,000 भारतीय नाविकों की सुरक्षा

इस संकट का एक मानवीय पहलू भी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में खाड़ी क्षेत्र में लगभग 20,000 भारतीय नाविक मौजूद हैं। इनमें से 528 नाविक सीधे तौर पर उन भारतीय जहाजों पर हैं जो फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। शिपिंग महानिदेशालय ने इन नाविकों की सुरक्षा के लिए एक त्वरित प्रतिक्रिया टीम (QRT) का गठन किया है।

निष्कर्ष: ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

यद्यपि ‘ग्रीन आशा’ का बाहर निकलना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण भारत की विकास दर पर दबाव बना रहेगा। भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए अब अपने कच्चे तेल के 70% आयात को लाल सागर और अफ्रीका के रास्ते मंगवाना शुरू कर दिया है, ताकि हॉर्मुज पर निर्भरता कम की जा सके।

जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT) पर इस सप्ताह ‘ग्रीन आशा’ का पहुंचना भारत की उस जीत का प्रतीक होगा, जो उसने युद्ध की विभीषिका के बीच अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हासिल की है।

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