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संयुक्त अरब अमीरात का ओपेक से बाहर होना

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वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने मंगलवार को ‘पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन’ (OPEC) और व्यापक ‘ओपेक+’ गठबंधन से अपनी सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की है। 1 मई, 2026 से प्रभावी होने वाला यह फैसला ओपेक के साथ यूएई के 59 साल पुराने जुड़ाव को खत्म कर देगा। यह कदम वैश्विक तेल बाजार में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहाँ अब खाड़ी देश सामूहिक अनुशासन के बजाय अपने राष्ट्रीय आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

यूएई की आधिकारिक समाचार एजेंसी (WAM) द्वारा जारी बयान के अनुसार, यह निर्णय देश की उत्पादन क्षमता और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्यों की समीक्षा के बाद लिया गया है। ओपेक के तीसरे सबसे बड़े उत्पादक के रूप में, जो समूह के कुल उत्पादन में लगभग 12% का योगदान देता था, यूएई के बाहर निकलने से तेल की कीमतों पर इस कार्टेल (गुट) का नियंत्रण काफी कमजोर हो जाएगा।

संप्रभुता और आर्थिक स्वायत्तता का फैसला

यूएई का ओपेक से अलग होना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह ओपेक+ ढांचे के भीतर वर्षों से चल रहे तनाव का परिणाम है, जिसका नेतृत्व मुख्य रूप से सऊदी अरब और रूस करते हैं। विवाद की मुख्य जड़ यूएई द्वारा अपने तेल बुनियादी ढांचे में किया गया भारी निवेश है। यूएई की सरकारी तेल कंपनी ‘एडनॉक’ (ADNOC) ने हाल ही में 150 अरब डॉलर का विस्तार कार्यक्रम शुरू किया है, जिसका लक्ष्य 2027 तक उत्पादन क्षमता को 50 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) तक पहुंचाना है।

ओपेक+ की उत्पादन सीमा (कोटा) प्रणाली के तहत, यूएई अपनी इस नई क्षमता का उपयोग करने में असमर्थ था, क्योंकि उसे वैश्विक कीमतों को बनाए रखने के लिए उत्पादन कम रखने पर मजबूर किया जा रहा था। ओपेक छोड़ने से अब यूएई को अपनी मर्जी से उत्पादन बढ़ाने और बेचने की “रणनीतिक स्वायत्तता” मिल जाएगी।

यूएई के विदेश मंत्रालय की संचार निदेशक अफ़रा महाश अल हमेली ने कहा, “ओपेक से बाहर निकलने का यूएई का निर्णय एक संप्रभु और रणनीतिक विकल्प है जो हमारे दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक जिम्मेदार और भविष्योन्मुखी भूमिका निभाने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”

भू-राजनीतिक तनाव और “ईरान कारक”

इस घोषणा का समय अत्यंत संवेदनशील है। ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही अस्थिर है। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति धमनी, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से बाजार से लगभग 79 लाख बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति कम हो गई है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।

हालांकि यूएई का उत्पादन फिलहाल इन शिपिंग बाधाओं के कारण सीमित है, लेकिन ओपेक से बाहर निकलने का मतलब है कि जैसे ही होर्मुज का रास्ता खुलेगा, यूएई बाजार में बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति कर सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ओपेक के कोटे के बिना, यूएई वैश्विक बाजार में 16 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त आपूर्ति जोड़ सकता है।

बाजार की प्रतिक्रिया: अस्थिरता और कीमतों में गिरावट की संभावना

बुधवार को बाजार में भारी अस्थिरता देखी गई। यूएई के बाहर निकलने की खबर से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में शुरुआत में 3% की गिरावट आई, क्योंकि व्यापारियों को 2020 की तरह “प्राइस वॉर” (कीमत युद्ध) छिड़ने का डर था। हालांकि, बाद में कीमतें स्थिर हो गईं क्योंकि निवेशकों को एहसास हुआ कि ईरान संघर्ष के कारण फिलहाल आपूर्ति में कमी बनी रहेगी।

दीर्घकालिक रूप से, विशेषज्ञों का मानना है कि ओपेक के कोटे से मुक्त यूएई कीमतों पर नीचे की ओर दबाव डालेगा। भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों के लिए यह एक सकारात्मक खबर है।

भारत के लिए रणनीतिक लाभ

भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए यूएई के इस कदम से भारत को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। यूएई वर्तमान में भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। वित्तीय वर्ष 2022 में दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार 11 अरब डॉलर था, जो वित्तीय वर्ष 2026 में बढ़कर लगभग 14 अरब डॉलर पहुंच गया है।

ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर सौरव मित्रा ने कहा, “मध्यम अवधि में यूएई के ओपेक से बाहर निकलने से वैश्विक तेल आपूर्ति में लचीलापन बढ़ेगा, जिससे कच्चे तेल की कीमतें नरम हो सकती हैं। भारत के लिए इसका मतलब है आयात लागत में कमी और मुद्रास्फीति के दबाव से राहत।”

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारत अब ओपेक के उत्पादन प्रतिबंधों की चिंता किए बिना यूएई के साथ अधिक लचीले और दीर्घकालिक द्विपक्षीय समझौतों पर बातचीत कर सकता है।

ओपेक के प्रभाव में कमी

यूएई के जाने के बाद, ओपेक में अब केवल 11 सदस्य रह गए हैं और वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी काफी कम हो गई है। यूएई जैसे बड़े उत्पादक के जाने से अब बाजार को स्थिर करने की पूरी जिम्मेदारी अकेले सऊदी अरब पर आ जाएगी। यह बिखराव इराक या कुवैत जैसे अन्य देशों को भी अपनी स्वायत्तता तलाशने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे भविष्य में ‘ओपेक+’ गठबंधन के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।

समन्वय से प्रतिस्पर्धा की ओर

ओपेक की स्थापना 1960 में तेल निर्यातक देशों के हितों की रक्षा के लिए की गई थी। यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ था। हालांकि, अमेरिकी शेल ऑयल के उदय और दुनिया के नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बढ़ने से खाड़ी देशों के लिए समीकरण बदल गए हैं। यूएई का नया दर्शन अब “मांग रहने तक अधिक उत्पादन और बिक्री” पर आधारित है।

यूएई का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति में एक युग के अंत का प्रतीक है। जबकि दुनिया फिलहाल ईरान-अमेरिका संघर्ष के साये में इसके तत्काल प्रभावों को देख रही है, भविष्य में इसका परिणाम अधिक प्रतिस्पर्धी और संभावित रूप से सस्ता तेल बाजार होगा। यूएई के लिए यह ‘पोस्ट-ओपेक’ भविष्य की ओर एक साहसी कदम है, और दुनिया के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा के एक नए अध्याय की शुरुआत है।

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