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‘तकनीक नहीं, कानून का पालन जरूरी’, एसआईआर प्रक्रिया पर बॉम्बे हाईकोर्ट की चुनाव आयोग को फटकार

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गोवा में एसआईआर पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, एक परिवार के 6 वोटरों के नाम हटने पर चुनाव आयोग से जवाब-तलब

मुंबई। गोवा में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने का मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। सुनवाई में अदालत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची में संशोधन के लिए तकनीक को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता। साथ ही आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम सूची से न छूटे।

एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी पर हाईकोर्ट सख्त

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत बिना सुनवाई का अवसर दिए मतदाताओं के नाम हटाए गए। अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियमों का हवाला देते हुए एसआईआर प्रक्रिया में सामने आई खामियों पर स्पष्टीकरण मांगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग की कोई भी प्रक्रिया कानून और नियमों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। यदि किसी मतदाता का नाम हटाया जाना है तो उससे पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत ने आयोग से यह भी पूछा कि बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार उसे किस कानून के तहत मिला है।

एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम हटाए गए

यह मामला गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र का है, जहां एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। खास बात यह है कि परिवार के सदस्यों ने अपना पता बदलने की जानकारी चुनाव आयोग को फॉर्म-8 के माध्यम से दी थी। इसके बावजूद उनके नाम सूची से हटा दिए गए।

चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने अदालत को बताया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान संबंधित सॉफ्टवेयर में फॉर्म-8 पर कार्रवाई करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसी तकनीकी समस्या के कारण परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हट गए और निर्धारित अवधि में उनके आवेदन पर कोई बदलाव नहीं किया जा सका।

तकनीक के बजाय कानून के पालन पर जोर

चुनाव आयोग की दलीलों पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कानून हर समय प्रभावी रहना चाहिए। सॉफ्टवेयर के संचालन और उसमें बदलाव करने का अधिकार संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) के पास होना चाहिए, ताकि वह अपने कानूनी आदेशों के अनुसार जरूरी संशोधन कर सके। अदालत ने कहा कि सॉफ्टवेयर किसी तीसरे पक्ष के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए।

खंडपीठ ने टिप्पणी की कि तकनीक का इस्तेमाल मतदाताओं के हितों की रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि उनके अधिकारों में बाधा डालने के लिए। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई भी पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहे।

अदालत ने पूछा, ऐसे कितने मामले सामने नहीं आए?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर की सीमाओं के कारण फॉर्म-8 पर कार्रवाई नहीं होने को गंभीर मुद्दा बताया। अदालत ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ समय के लिए कानून और नियमों को दरकिनार कर दिया गया है और एक अलग प्रक्रिया लागू कर दी गई है।

खंडपीठ ने इस मामले पर चिंता जताते हुए कहा कि फिलहाल अदालत के सामने छह मतदाताओं का मामला है, लेकिन ऐसे कितने अन्य लोग होंगे, जिनके नाम भी इसी तरह मतदाता सूची से हटा दिए गए होंगे और जो न्याय पाने के लिए अदालत तक नहीं पहुंच सके। अदालत ने इस पूरे मामले के प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।

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